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करो या मरो का नारा किसने दिया था?

करो या मरो का नारा किसने दिया था?
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई ऐसे नारे और आंदोलन हैं जिन्होंने देशवासियों के दिलों में आग लगा दी और उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने के लिए प्रेरित किया। इन्हीं में से एक प्रसिद्ध नारा है – “करो या मरो”। यह नारा न केवल एक आह्वान था, बल्कि यह भारतीयों के दृढ़ संकल्प और बलिदान की भावना का प्रतीक बन गया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह नारा किसने दिया था और इसके पीछे की कहानी क्या है? आइए, इस लेख में विस्तार से जानते हैं।

Do or Die

करो या मरो का नारा किसने दिया?

“करो या मरो” का नारा भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने दिया था। यह नारा उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) के दौरान दिया था। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य था – अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर करना और पूर्ण स्वराज (पूर्ण स्वतंत्रता) की मांग करना।

गांधीजी ने यह नारा 9 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान (जिसे अब अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाता है) में दिया था। उन्होंने भारतीयों से कहा कि यह समय संघर्ष का है, और हमें यह तय करना होगा कि हम या तो आजादी पाने के लिए कुछ करेंगे या फिर इसके लिए बलिदान देंगे।


करो या मरो का अर्थ

“करो या मरो” का अर्थ है – “या तो आजादी के लिए संघर्ष करो, या फिर इसके लिए बलिदान हो जाओ”। यह नारा भारतीयों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन गया। इसने लोगों के मन में यह भावना जगाई कि अब समय आ गया है जब हमें अपनी आजादी के लिए पूरी ताकत झोंक देनी चाहिए।

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गांधीजी ने इस नारे के माध्यम से यह संदेश दिया कि अब कोई और रास्ता नहीं बचा है। या तो हम अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर करेंगे, या फिर इस संघर्ष में अपने प्राणों की आहुति देंगे।


भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि

1942 का समय द्वितीय विश्व युद्ध का दौर था। अंग्रेज भारत को बिना भारतीयों की सहमति के युद्ध में झोंक चुके थे। इससे भारतीयों में गहरी नाराजगी थी। गांधीजी ने महसूस किया कि यही सही समय है जब भारत अंग्रेजों से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग कर सकता है।

8 अगस्त 1942 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बंबई अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया गया। अगले दिन, 9 अगस्त को गांधीजी ने यह ऐतिहासिक नारा दिया।


करो या मरो नारे का प्रभाव

“करो या मरो” नारे ने पूरे देश में एक नई ऊर्जा का संचार किया। इसके बाद देशभर में अंग्रेजों के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और हड़तालें हुईं। लोगों ने सरकारी संस्थानों, रेलवे स्टेशनों और डाकघरों पर हमले किए।

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अंग्रेजी सरकार ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए कड़े कदम उठाए। गांधीजी सहित कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन यह आंदोलन इतना शक्तिशाली था कि अंग्रेजों की नींव हिल गई।


करो या मरो का ऐतिहासिक महत्व

  1. जन-जागरण: इस नारे ने आम जनता को जगाया और उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदार बनाया।
  2. अंग्रेजों के खिलाफ एकजुटता: इसने भारतीयों को एक साथ ला दिया, चाहे वे किसी भी जाति, धर्म या वर्ग के हों।
  3. स्वतंत्रता की ओर बढ़ते कदम: यह आंदोलन भारत की आजादी की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

निष्कर्ष

“करो या मरो” का नारा केवल एक नारा नहीं था, बल्कि यह भारतीयों के दिलों में आजादी की अलख जगाने वाला एक मंत्र था। महात्मा गांधी ने इस नारे के माध्यम से भारतीयों को यह संदेश दिया कि अब समय आ गया है जब हमें अपनी आजादी के लिए पूरी ताकत लगा देनी चाहिए।

यह नारा आज भी हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता की कीमत कितनी बड़ी होती है और इसे पाने के लिए कितने बलिदान की आवश्यकता होती है। भारत छोड़ो आंदोलन और “करो या मरो” का नारा हमारे इतिहास के सबसे गौरवशाली अध्यायों में से एक है, जो हमें हमेशा प्रेरित करता रहेगा।

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